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Archive for the ‘किसान’ Category

कुच्छ बुडों के ब्लोगिंग के बारे में सोलह दिसंबर (इतवार) की टैंस ओफ इन्ड्या में छापे नामों में मेरा नाम भी शामिल हैं। श्रीमति. मीनाक्षि कुमार् ने कुच्छ लब्जों में मेरे बारे में जो कुच्छ लिखी गई हैं वह केरल की एक मामूली किसान को बहूत ही महत्वपूर्ण हैं। लेखिका ने ऐसे अंग्रेजी में लिखी हैं। Interestingly, Chandrashekhar Nair, 58, has been blogging for close to four-five years. A former serviceman and a farmer, his blogs are on agriculture. “What I like most about blogging is that one can get a response within seconds of publishing a blog,” says the Thiruvananthapuram-based Nair, who blogs in English, Hindi and Malayalam.

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2006-07 वर्ष में स्वाभाविक रबर की लभ्यता और ज़रूरत

आजतक किसी माध्यम ने ऐसे स्वाभाविक रबर की विश्लेषण प्राप्त नहीं किया हॊगा। ऐसे कुच्छ हिसाब यहाँ मौजूद हैं। 2006-07 वर्ष में स्वाभाविक रबर की पैदावार (production) 852,895 टणों (tonnes), उपभोग 820,305 टणों और पिझले महीने याने कि 31 मार्च 2006 में बचत 93,020 टणों थे। इससे यह मालूम होगा कि भारत रबर केलिये स्वतःपूर्ण है। बगैर ज़्रूरत के 89,699 ट्णों की आयात और 56,545 टणों की निर्यात किसलिये थी? सच यह है देशि और विदेशि बजारों में रबर की दाम गिराना ही लक्षય था। 2006-07 वर्ष की आँकडे और उसकी विश्लेषण नीचे दिया हुआ सारणी 1 में मौजूद हैं।

किसानों की बेचना = (पिछ्ले महीने की बचत + पैदावार) – महीने की आखिर में सम्भार = (22,125+ 84900)-53885 = 827,050 लेकिन रबर बोर्ड के अनुसार 849,000 टणों की बदले में 852,895 प्रकाशित की गयी हैं।

निर्मातों की खरीदना = (उपभोग + महीने की बचत) – (शुरू की बचत या opening stock+ आयात) = (820,305+ 70,480) – (89,699+ 49,990 ) = 751,096 टणें हैं।

सारणी 1

महीने पिझले महीने की बचत पैदावार किसानों की बेचना निर्मातावों की खरीद
एप्रिल 22125 54555 59705 54597
मेय 16975 56500 59070 56106
जूण 14405 57610 61990 57738
जूलै 10025 65500 64125 53955
आगस्ट 11400 74495 74690 64432
सेप्टंबर 11205 73550 73870 68262
ओक्टोबर 10885 82970 77830 69516
नवंबर 16025 95525 73460 70103
डिसंबर 38090 101680 80755 67345
जनुवरि 59015 96450 93390 71384
फेब्रुवरि 62075 47560 55750 56482
मार्च 53885 42605 52415 61176
कुल मिलाकर   84900 827050 751096

सारणी 2 में आयात निर्यात की जानकारी है। सारणी 1 और सारणी 2 की विश्लेषण करने पर सबसे ज़्यादा पैदावार ओक्टोबर से लेकर जनुवरी तक है और उसी समय पर देशी बाजार में आर.एस.एस 4 की दाम अंतरदेशीय बाजार (Bangkok) की आर.एस.एस 3 से ऊपर दाम रहा हैं। साथ ही आयात बढा दी। इस से यह मालूम हो सकता है कि सौदागार (Dealer) और निर्माताओं की किसानों के खिलाफ क्री चाल है जो देशी और अंतरदेशीय दाम कई महीने तक गिराने की प्रयास था। लेकिन इस साल की शुरू में गर्मी और काम करनेवाले मजदूरों को कठिन बुखार होना और बाद में लगातार बारिश के कारण रबर की पैदावार बहूत कम हुआ है। निर्यात किया गया 56,545 टणों की औसत दाम आर.एस.एस 4 की 9204 रुपये प्रति किनटल (per quintal) थे और आयात किया गया 89,699 टणों की औसत दाम आर.एस.एस 3 की 9779 प्रति किनटल थे।‍ जब सारे हिसाब प्राप्त होगा तब यह मालूम पडेगा कि आयात निर्यात की दाम इन दामों से नीचे होगा।लेकिन 89,699 टणें 8698 रु प्रति किन्टल की हिसाब से हुआ।

निर्यात करनेवाले दामों में भारत के निर्माताओं को आयात के बदले में देना चाहिये। ऐसे आयात निर्यात से घाटा बहूत ही बडा रकम हैं।

सारणी 2

महीने आयात आर.एस.एस 3 की दाम निर्यात आर.एस.एस 4 की दाम
एप्रिल 3439 9695 6031 8634
मेय 6511 10998 6801 9841
जूण 6437 12484 9901 10692
जूलै 5011 11710 8456 9821
आगस्ट 2856 10303 10226 9182
सेप्टंबर 622 8480 6150 8169
ओक्टोबर 1307 8463 2041 8709
नवंबर 5653 7426 954 8260
डिसंबर 12517 7811 923 8615
जनुवरि 9876 9319 624 9716
फेब्रुवरि 17736 10605 720 9757
मार्च 15799 10050 3552 9057
कुल मिलाकर 87764 9779 56379 9204

ज़्यादा जानकारि केलिये Supply & Demand मैक्रोसोफ्ट एक्सल वर्कशीट देखिये।

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सारे दुनियाँ में सम्पत्ती की लभ्यता पर भारत १२ स्थान पर पहूँचा हैं। उसकेलिये किसानों को कर्जेदार और गरीब रखना पडरहा हैं। रुपये की दाम उँचा रखनेकेलिये खाने पीने की चीजों का दाम कम रखना जरूरी हैं। उसकेलिये खेतों में उगलनेवाले धान्य की दाम कम रखने पर बेरोजगारी सरपर लेली हैं। उसी उद्देश प्राप्त करनेकेलिये तेल, गेहू आदि चीजों के आयात कर रहे हैं। बान्कों (Banks) की मुनाफा बडाने केलिये जमीन की documents जमा करके कर्ज या उदार देकर हुद्खुशी (suicide) करने केलिये मजबूर कर रहे हैं। विदर्फा में ८ घंटे में एक हुद्खुशी प्रधानमंत्री के पाकेज से पहले होता था अब ४ घंटे में एक हो गया। किसानों को मुनाफा होना कयी सालों से मना हैं।

किसानों को सपना देखने केलिये क्या क्या वादायें, तरीके, सुविधायें, बजट में भारि रकम वगैरा दिखाकर इस देश को सम्पन्न करने में केन्द्र सर्कार की तरफ से बहूत कुच्छ कर रहे हैं। घाटे में खेती कितने किसानों को कर सकेगा? अगर खेती की हाल कुच्छ साल यही होगा तो हमें खाने पीनेकेलिये सब्कुच्छ आयात करना पडेगा। किसान उत्पादक (producer) और consumer भी है। ऐसे हालात में सब्जी, चावल, गेहू आदि चीजों की सही दाम की लभ्यता चाह्ते हैं तो खाने पीने की चीजों की आयात बंद करना ही अच्छा होगा। किसानों के नाम पर आँसू बहाने से कोई भी कठिनाई हल नहीं होगा।  नारियल की तेल, पाँऒइल, सोयाबीन तेल वगैरह आयात करके सरसों, नारियल, मुम्फल्ली, सूरज मुखी आदि खेतियों के विनाश होरहा हैं। Agri business किसानों को लूट्नेकेलिये हैं।

जमीन की बर्बादी soil testing laboratories कर रहा है। एन.पि.के के जाँच और इस्तेमाल acidic soil बनाकर पौदों, पशु पक्षियों  और इन्सान को बीमारियाँ प्रदान कर रहे हैं। रासायनिक एन (नैट्रग्न) जमीन की इसतेमाल pH कम होने और पेड पौधों को भूखा मारते हैं। secondary neutrients & trace elements  के काम इन्को मालूम नहीं है क्या? जहरें झिडक कर जमीनि कीडाओं (earth worms) को मार दी और पीने की पानि भी बर्बाद करदी। दिन पर दिन कई किसम के बीमारियाँ फैल रहे है और इलाज मेहगा भी पडरहा हैं।  

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चिट्ठ चर्चा 

किसानों आप लोग सोरहा हैं क्या ?   अब समय आगया जागने का। जो खाने पीने की दाम बढजायेगा तो रुपये का मूल्य कम होजायेगा । उस वजह से सबजी, चावल, गेहू आदी चीजों की दाम बढने से रोकने की केशिश चारों तरफ से हो रहा हैं। sharemarket की इन्डेक्स बढें, जाली रुपया फैलें(जो नहीं होना चाहिए), सरकारी कर्मचारियों के धनका बढें, बेंकों (Banks) में पैसा deposit  ज्यादा होजायें तो रुपये की मूल्य बढ जायेगी और डोलर (dollar) की दाम कम होजायेगा। सरकारी कर्मचारियों को  पिछले 23 साल से धनका दस दशमल पाँच गुणा बडगया, खेतों में काम करने वाले मजदूर का भी दस गुणा बढा लेकिन सबजी, गेहू या चावल की दाम में कितना बढोत्री हुआ ? मेरा पेनषन (pension) 1985 में 372 था तो अब 3100 करीब हैं। जब मेरा DA बढेगा तब essential comodities में खाने पीने की चीजों को प्रथम स्थान हैं क्या ?

जब रुपये की मूल्य कम होजायेगा विदेशों में काम करनेवाला पैसा हिन्दुस्तान में भेजकर उनको ज्यादा कमाई हो जायेगा। जब  रुपया की मूल्य बढेगा उनके कमाई कम हो जयेगा। इस का मतलब यह हैं कि खाद्य सामग्रियों का दाम बढेगा तो किसानों और विदेश में काम करनेवालों को मुनाफा होगा। परन्तू हमारा देश यह नहीं चाहता।  Agricultural produces की दाम कम रहें और बिना टाक्स या ड्यूटी की आयात निर्यात (Export Import) कर सके यही हमारे सरकार की कओशिश हैं या WTO का दबाव जारी हैं। भारी रकम सब्सिडी देकर चीनी का निर्यात गन्ने किसानों को मदद करने केलिले हैं क्या ? नहिं यह सब कुच्छ मध्यवर्ती (Middlemen) को मदद करने केलिये ही हैं। रबर आयात केलिये तायलन्ट से समझोदा (agrement) करके रबर बोर्ड की चेयरमान किसानों को मदद करने केलिये निर्यात करनेवालों को इक्कटा कर रहे हैं। आदरणीय कमलनाथ जी बोलता हैं कि भारत में रबर की कमी हैं और चेयरमान बोलते हैं कि रबर दिसंबर 31 तारिक को 1,41,000 टणें (Tonnes) ज्यादा स्टोक हैं।

खेती करके घाटे या भारी कर्ज की कारण किसान आत्महत्या (Suicide) करें तो भी कोई बात नहीं। खून पशीना बहाकर जो जमीन से पैदा करके कम या सस्ते दामों में सफेद कोलर (white collar) कर्मचारियों को खिलाना पिलाना किसानों के कर्तव्य हैं क्या ? किसान भी किसानों के खिलाफ हैं। अपने पैदा किया हुआ चीजों का ही सही दाम चाहते हैं। दूसरों के पैदा किया हुआ चीजें सस्ते में खरीदना ही चाहता हैं। अगर एक किसान दूसरे का पैदा किया हुआ चीजें सही दामों में (above cultivation cost & profit) खरीदेगा तो किसी को हिम्मत नहीं होगा डोलर की मूल्य बढजायेगा या रुपये की मूल्य गिर जायेगा करके खाने पीने की चीजों का दाम गिराने का। क्यों कि किसानों की गिन्दी भारत में सबसे ज्यादा हैं।  

भारतीय किसानों के पैदा किया हुआ चीजें कम दामों में निर्यात करके उसी चीजें ऊँचे दामों में भसल उगालते वक्त पर आयात करना अपने खजाना लूटने की बराबर नहीं हैं क्या ? WTO किसानों के खिलाफ हैं।

क्या आपको पता हैं ? हिन्दुस्थान में हर बच्चा जनम लेता हैं भारी विदेशि कर्ज के साथ। सिर्फ केरल की विदेशि कर्ज 57,000 क्रोर हैं। यहाँ जो revenue income सरकार को मिलते हैं उसमें से 92% सरकारी कर्मचारियों का धनका और पेनषन (pension) केलिए और बाकि विदेशि कर्ज के interest देनें में लग जाता हैं। इस हालात में देश की विकास कैसे होगा ? World Bank, IMF, ADB आदी हमें विकास के नाम लूटेगा। हर State का यही हाल हैं।

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मैं ने हिन्दी में प्रथम पोस्ट या लेख प्रकाशित किया है। 

भारत वासियों केलिये केरल से एक मामूली किसान कुच्छ बातों के विशकलन कर रहा हूँ। भारत की आबादी बड रहा हैं। लेकिन खाने पीने की चीजों की कमी शुरु होगया। साथ ही गुण भी गायब हो रहा हैं। क्यों कि जमीन कि जैव संपत्ति खतम हो रहा हैं। साफ मतलब यह हैं कि जमीन मर रहा हैं। जिंदा जमीन कि ऊपरी हिस्से में earth worms की कमी जरूरत से ज्यादा रासायनिक खाद और कीडे मकोडे केलिये जो जहर झिडकते हैं उसी वजह से हो रहा हैं। जो मनुष्य को हजम नहीं होगा वे पानि, मिट्टी, हवा और सौरोर्ज को भी हजम न्हीं होगा। यहाँ क्रृषि उद्योग जहरों के प्रचारक बनकर सर्वनाश की ओर हमें पहुँचाने में कठिन प्रयत्न कर रहे हैं।

जो जहर मनुष्य के मृत्यु के कारण हो सक्ता हैं, उसी जहर को थोडी मात्रा में पौधों को देने से वही जहर मनुष्य को धीरे धीरे मृत्यु की ओर ले जाता हैं। परंतु पौधे जहर की असर थीरे थीरे प्रकट कर्ता हैं। जहर की प्रयोग पैदावार जरूर बढायेगा लेकिन उसका प्रभाव आनेवाली पीडी पर जरूर होगा। वह पीडी अपाहिज, मंदबुद्धी, कर्क जोजी आदि के शिकार होने की संभावना शत प्रतिशत हैं।

जो जहर पेड पौधे या जमीन पर झिडकते हैं उसमें ज्यादा हिस्सा समुन्दर में पहूँचता हैं। बाकि कुच्छ पेड पौधे के अंदर और भूजल में मिल जायेगा। जो deepwell से mineral water मिलता था वह आज कल कीडे मकोडे खतम करने केलिये इसतेमाल कर सकते हैं। जो जहर समुन्दर में जैव संपत्ति के साथ पहूँचते हैं वह मछली को खाने का कीडों की पैदा होने नहीं देगा।

केरल में कासर्गोट (Kasargodu) जिले में काजू की पेडों में जो ‘एन्टोसलफान’ (Endosulfan) झिडक्ने पर इर्द गिर्द के इलाके में जो कुच्छ भुगत रहा हैं वह हम देख रहा हैं। केला कि पौदों में इस्तेमाल करनेवाला ‘कार्बोफुरान’  (Carbofuran)  एन्टोसलफान से ज्याद जहरीला हैं। पिछले साल केरल में चूहों को मारने केलिये मुफ्त में ‘रोडोफे’ (Rodofe)  नाम कि ‘ब्रोमोडियोलोण’ (Bromadiolone) दिया था वह इन सब से जहरीला था। 

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