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Archive for फ़रवरी, 2007

Indian Rubber Board

Indian Rubber Board, Kottayam, Kerala

रबर के हिसाब रबरबोर्ड (Rubber Board) का ही प्रकाशिट करने वाला वेब सैट और हर महीने की ‘रबर स्टाटिस्टिकल न्यूस’ भी मौजूद हैं। वह नीचे दिया हुआ पन्ने ‘मैक्रोसोफट एक्सल वर्क्कषीट पेजों’ (Microsoft excel worksheet pages) में देख सकते हैं। लभ्यता के अनुसार समय समय पर हिसाब जोडता हैं।

1. 1990 से लेकर अब तक का हिसाब

2. 2006 – 2007 के रबर की हर दिन के मूल्य, हर महीने की निर्यात, आयात आदी

3. 1996-97 से लेकर अबतक सबकुच्छ

4. भारत से विदेशोम में रबर निर्यात (export) करने से घाटा भारि रकम

5. बदले में विदेश से जो आयात (Import) करने का दाम भी कम कैसे हैं?

6. आपूर्ति और ज़रूरत 2006-07 (Supply and Demand)

ऐसे जो हिसाब हमारे सामआयात करनाने आता हैं उससे स्पष्ट जाहिर होत हैं कि सब से ज्यादा नुकसान किसानों और जो रबर से च्छोटे च्छोटे वस्तु बनाते हैं (Small scale Industries)। सारे के सारे एक्सपोर्ट केरल से होता हैं। इसकेलिये मदत सर्कार की तरफ से और रबर बोर्ड की तरफ् से होता हैं। दक्षिण भारत में क्या हो रहा हैं उत्तर भारत वासियों को पत नहीं और् उलटा फी हो रहा हैं। उदाहरण के तौर पर पंजाब में गेहु को किसानों का मिल्नेवाला दाम और केरळ में इसीका खरीदने का दाम में अंतर बहूत हैं। वैसे ही रबर भी दामों में अंतर बहूत हैं। केन्द्र सरकार की तरफ से निर्यात कर्नेवालों को बहूत सहायता भी मिल्ते हैं। रबर बोर्ड जो हमें इन सबका हिसाब देता हैं वैसे और किसी भी चीज के बारे में हमको प्राप्त नहीं।

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भारतीय Rubber treesस्वाभाविक रबर की उत्पादन दुनियां में चौथा स्थान पर हैं। उसमें 92 प्रतिशत केरल में से हैं। रबर एक ऐसे पेड हैं जिसका ‘सैलम’ याने की तना (Stem) की सफेद हिस्सा बहूत ज्यादा हैं। उसी वजह से गर्मी शुरु होने से पहले इस पेड के सारे के सारे पत्ते सूखकर गिर जाते हैं और गर्मियों के समय हरे पत्तों से भराहुआ छायेदार रह्ता हैं। तना के ऊपर्वाले हिस्सा छाल(bark) एक अलग किसम का चाकू से झील्कर लाटेक्स कपों के सहायता से इकट्टा कर्ते हैं। लाटेक्स और जो रबर षीट से ‘हान्ड ग्लौस’ (hand gloves) टयर (Tyre) वगैरा और कई किसम के चीजें बनते हैं। यह अलग अलग इस्तेपाल केलिये काम आते हैं।

भारत में ‘मिनिस्ट्रि ओफ इन्डुस्ट्रि आन्ड कोमेर्स’ (Ministry of Industry and Commerce) के नीचे किसानों, व्यापारियों और व्यवसायियों को मदद कर्ने केलिये एक रबर बोर्ड केरल में कोट्टयम जिने में हैं। उत्पादन, भण्डार, उपभोग करना, निर्यात करना (export) और इम्पोर्ट (import) आदी के हिसाब इस बोर्ड ‘वेब सैट’ (web site)और झाप्कर (printed) पब्लिष (publish) कर्ते हैं।

रबर की खेती के बारे में हमें जो रबर बोर्ड के वैग्यानिकों से प्राप्त हुआ उन में कयी गलतियॉ भी हैं। उडाहरण के तौर पर रबर की खेतोम में उतपादन कम होने का कारण ‘ब्रौण बास्ट’ (Brown bast)से ‘नेक्रोसिस’ (Necrocis) होजाता हैं। आज तक इस्का कारण और इलाज दुनियॉ में किसी भी वैग्यानिक स्पष्ट नहीम किया। परन्तू इसी बीमारि का कारण और इलाज मैं बताने से भी चुप रह जाते हैं। इस बीमारि का कारण कोश के मरजाना हैं। इन कोशों को जिन्दा रखने केलिये मग्नीष्यम सलफेट (magnesium Sulphate)  की देना जरूरि हैं। लेकिन किसी को यह नहीं पता है यूरिया, अमोणियम सल्फेट और फाक्टम फोस के साथ मग्नीष्यम डदेने से उल्टा असर् होता हैं। क्योम् कि रासायनिक (Chemical) खादोम् में ‘एन’ (N) जो हैं वह् अम्लस्वभाव (Acidic soil) का होता हैं और मग्नीष्यम जो हैम् क्षारस्वभाव (Alkaline Soil) की जमीन में ही ठीक से काम करेग। रासायनिक एन जो हैं मट्टी कि ‘पीएच्च’  (pH) नीचे लायगा। 

‘अपूर्ण’
    

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मैं ने हिन्दी में प्रथम पोस्ट या लेख प्रकाशित किया है। 

भारत वासियों केलिये केरल से एक मामूली किसान कुच्छ बातों के विशकलन कर रहा हूँ। भारत की आबादी बड रहा हैं। लेकिन खाने पीने की चीजों की कमी शुरु होगया। साथ ही गुण भी गायब हो रहा हैं। क्यों कि जमीन कि जैव संपत्ति खतम हो रहा हैं। साफ मतलब यह हैं कि जमीन मर रहा हैं। जिंदा जमीन कि ऊपरी हिस्से में earth worms की कमी जरूरत से ज्यादा रासायनिक खाद और कीडे मकोडे केलिये जो जहर झिडकते हैं उसी वजह से हो रहा हैं। जो मनुष्य को हजम नहीं होगा वे पानि, मिट्टी, हवा और सौरोर्ज को भी हजम न्हीं होगा। यहाँ क्रृषि उद्योग जहरों के प्रचारक बनकर सर्वनाश की ओर हमें पहुँचाने में कठिन प्रयत्न कर रहे हैं।

जो जहर मनुष्य के मृत्यु के कारण हो सक्ता हैं, उसी जहर को थोडी मात्रा में पौधों को देने से वही जहर मनुष्य को धीरे धीरे मृत्यु की ओर ले जाता हैं। परंतु पौधे जहर की असर थीरे थीरे प्रकट कर्ता हैं। जहर की प्रयोग पैदावार जरूर बढायेगा लेकिन उसका प्रभाव आनेवाली पीडी पर जरूर होगा। वह पीडी अपाहिज, मंदबुद्धी, कर्क जोजी आदि के शिकार होने की संभावना शत प्रतिशत हैं।

जो जहर पेड पौधे या जमीन पर झिडकते हैं उसमें ज्यादा हिस्सा समुन्दर में पहूँचता हैं। बाकि कुच्छ पेड पौधे के अंदर और भूजल में मिल जायेगा। जो deepwell से mineral water मिलता था वह आज कल कीडे मकोडे खतम करने केलिये इसतेमाल कर सकते हैं। जो जहर समुन्दर में जैव संपत्ति के साथ पहूँचते हैं वह मछली को खाने का कीडों की पैदा होने नहीं देगा।

केरल में कासर्गोट (Kasargodu) जिले में काजू की पेडों में जो ‘एन्टोसलफान’ (Endosulfan) झिडक्ने पर इर्द गिर्द के इलाके में जो कुच्छ भुगत रहा हैं वह हम देख रहा हैं। केला कि पौदों में इस्तेमाल करनेवाला ‘कार्बोफुरान’  (Carbofuran)  एन्टोसलफान से ज्याद जहरीला हैं। पिछले साल केरल में चूहों को मारने केलिये मुफ्त में ‘रोडोफे’ (Rodofe)  नाम कि ‘ब्रोमोडियोलोण’ (Bromadiolone) दिया था वह इन सब से जहरीला था। 

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