2006-07 वर्ष में स्वाभाविक रबर की लभ्यता और ज़रूरत
आजतक किसी माध्यम ने ऐसे स्वाभाविक रबर की विश्लेषण प्राप्त नहीं किया हॊगा। ऐसे कुच्छ हिसाब यहाँ मौजूद हैं। 2006-07 वर्ष में स्वाभाविक रबर की पैदावार (production) 852,895 टणों (tonnes), उपभोग 820,305 टणों और पिझले महीने याने कि 31 मार्च 2006 में बचत 93,020 टणों थे। इससे यह मालूम होगा कि भारत रबर केलिये स्वतःपूर्ण है। बगैर ज़्रूरत के 89,699 ट्णों की आयात और 56,545 टणों की निर्यात किसलिये थी? सच यह है देशि और विदेशि बजारों में रबर की दाम गिराना ही लक्षય था। 2006-07 वर्ष की आँकडे और उसकी विश्लेषण नीचे दिया हुआ सारणी 1 में मौजूद हैं।
किसानों की बेचना = (पिछ्ले महीने की बचत + पैदावार) – महीने की आखिर में सम्भार = (22,125+ 84900)-53885 = 827,050 लेकिन रबर बोर्ड के अनुसार 849,000 टणों की बदले में 852,895 प्रकाशित की गयी हैं।
निर्मातों की खरीदना = (उपभोग + महीने की बचत) – (शुरू की बचत या opening stock+ आयात) = (820,305+ 70,480) – (89,699+ 49,990 ) = 751,096 टणें हैं।
सारणी 1
| महीने | पिझले महीने की बचत | पैदावार | किसानों की बेचना | निर्मातावों की खरीद |
| एप्रिल | 22125 | 54555 | 59705 | 54597 |
| मेय | 16975 | 56500 | 59070 | 56106 |
| जूण | 14405 | 57610 | 61990 | 57738 |
| जूलै | 10025 | 65500 | 64125 | 53955 |
| आगस्ट | 11400 | 74495 | 74690 | 64432 |
| सेप्टंबर | 11205 | 73550 | 73870 | 68262 |
| ओक्टोबर | 10885 | 82970 | 77830 | 69516 |
| नवंबर | 16025 | 95525 | 73460 | 70103 |
| डिसंबर | 38090 | 101680 | 80755 | 67345 |
| जनुवरि | 59015 | 96450 | 93390 | 71384 |
| फेब्रुवरि | 62075 | 47560 | 55750 | 56482 |
| मार्च | 53885 | 42605 | 52415 | 61176 |
| कुल मिलाकर | 84900 | 827050 | 751096 |
सारणी 2 में आयात निर्यात की जानकारी है। सारणी 1 और सारणी 2 की विश्लेषण करने पर सबसे ज़्यादा पैदावार ओक्टोबर से लेकर जनुवरी तक है और उसी समय पर देशी बाजार में आर.एस.एस 4 की दाम अंतरदेशीय बाजार (Bangkok) की आर.एस.एस 3 से ऊपर दाम रहा हैं। साथ ही आयात बढा दी। इस से यह मालूम हो सकता है कि सौदागार (Dealer) और निर्माताओं की किसानों के खिलाफ क्री चाल है जो देशी और अंतरदेशीय दाम कई महीने तक गिराने की प्रयास था। लेकिन इस साल की शुरू में गर्मी और काम करनेवाले मजदूरों को कठिन बुखार होना और बाद में लगातार बारिश के कारण रबर की पैदावार बहूत कम हुआ है। निर्यात किया गया 56,545 टणों की औसत दाम आर.एस.एस 4 की 9204 रुपये प्रति किनटल (per quintal) थे और आयात किया गया 89,699 टणों की औसत दाम आर.एस.एस 3 की 9779 प्रति किनटल थे। जब सारे हिसाब प्राप्त होगा तब यह मालूम पडेगा कि आयात निर्यात की दाम इन दामों से नीचे होगा।लेकिन 89,699 टणें 8698 रु प्रति किन्टल की हिसाब से हुआ।
निर्यात करनेवाले दामों में भारत के निर्माताओं को आयात के बदले में देना चाहिये। ऐसे आयात निर्यात से घाटा बहूत ही बडा रकम हैं।
सारणी 2
| महीने | आयात | आर.एस.एस 3 की दाम | निर्यात | आर.एस.एस 4 की दाम |
| एप्रिल | 3439 | 9695 | 6031 | 8634 |
| मेय | 6511 | 10998 | 6801 | 9841 |
| जूण | 6437 | 12484 | 9901 | 10692 |
| जूलै | 5011 | 11710 | 8456 | 9821 |
| आगस्ट | 2856 | 10303 | 10226 | 9182 |
| सेप्टंबर | 622 | 8480 | 6150 | 8169 |
| ओक्टोबर | 1307 | 8463 | 2041 | 8709 |
| नवंबर | 5653 | 7426 | 954 | 8260 |
| डिसंबर | 12517 | 7811 | 923 | 8615 |
| जनुवरि | 9876 | 9319 | 624 | 9716 |
| फेब्रुवरि | 17736 | 10605 | 720 | 9757 |
| मार्च | 15799 | 10050 | 3552 | 9057 |
| कुल मिलाकर | 87764 | 9779 | 56379 | 9204 |
ज़्यादा जानकारि केलिये Supply & Demand मैक्रोसोफ्ट एक्सल वर्कशीट देखिये।









sahi baat he dost/ dukh is baat ka he ki in muddo par aawaj tak koi nhi utha raha he…
बहुत दिनों बाद लौटे आप. लेकिन बहुत अच्छा विषय लेकर लौटे हैं.
bhaskar, संजय तिवारी : धन्यवाद
WTO क्या इसी किसम का आयात निर्यात कर्के किसानों को मार्ना चाह्ता हैं क्या? पंजाब में गेहू की फसल काट्ते ही गेहू की मेह्गे दाम से आयात करना और पंजाब की किसानों से कम दाम से गेहू जमा कर्ते हैं। साथ ही कम दाम में गेहू की निर्यात भी हो रहा हैं। सर्कारि कर्मचारियों को जिस अनुपात से धनका बढ्ते है उसी अनुपात फसल या जमीन से जो पैदवार है उनका दाम नहीं बड्ता। कारण यह बताता हैं कि खाने पीने की चीजों की दाम बड्ने से Dollar की मूल्य बड जायेगा। खेती की आंदनी कम होने की कारण कई किसानें खुद्खुशी कर रहा हैं। इस बात पर किसी को पर्वा नहीं। आन्द्रा प्रदेश (Andrapradesh) में सूत की खेती करने वाले किसान बहूत खुशी मना रहे हैं। क्यों कि जि.एम बीज के फसल से कीडे मकोडे का आक्रमण रोक सका। क्यों कि हरे पत्ते पर जो कीडा मकोडे आ कर उस्की रस पीयेग वह मर जायेगा। सूत की फसल काटने के बाद जो गाय उस ज़मीन से खास वगैरह खाने से मर गया। उसी तरह जो Cotton Seed Oil जो हमें खाने केलिये मिलेगा वह खाने से हम न्हीं करके कोयि बता सक्ते हैं क्या? किसानूम को धाटे में डाल्कर खेती से दूर भगा रहे हैं। यह भविष्य में हमें भूखा मारेगा। कभी कभी रबर को ज्यादा दाम देकर उसी का खेती फैला रहे हैं। हम आयात कर्ने केलिये रबर पैदा करेगा तो भी भूखा मर्ने की संभावना हैं।
लहर नई है अब सागर में
रोमांच नया हर एक पहर में
पहुँचाएंगे घर घर में
दुनिया के हर गली शहर में
देना है हिन्दी को नई पहचान
जो भी पढ़े यही कहे
भारत देश महान भारत देश महान ।
NishikantWorld
चन्द्रशेखरन नायर जी, आपकी सोच, पृष्ठभूमि और काम तीनों लाजवाब हैं। केरल के होते हुए भी आप इतनी अच्छी हिंदी लिख रहे हैं। फिर किसानों की समस्या को इतने micro level पर उठा रहे हैं। आप यकीनन साधुवाद के हकदार हैं।
अनिल रघुराज जी: ऐसे विषय पर मीडिया समस्याओं को ठीक तरीके से सबके सामने नहीं लाते। क्यों कि क्लास्सिफैडस एक ऐसे चीज हैं सब मीडिया के मुँह बंद कर देगा। ब्लोग ऐसे मौका देता हम दुनियां के सामने सबकुच्छ बता सकता हैं।